Saturday, 14 November 2020

Mirza Ghalib Shayari | Galib ki Shayari

Mirza Ghalib Shayari

Ghalib Shayari

 हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे

कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

भीगी हुई सी रात में जब याद जल उठी,

बादल सा इक निचोड़ के सिरहाने रख लिया !!

अब अगले मौसमों में यही काम आएगा,

कुछ रोज़ दर्द ओढ़ के सिरहाने रख लिया !!

Hindi Shayari of Ghalib 

वो रास्ते जिन पे कोई सिलवट ना पड़ सकी,

उन रास्तों को मोड़ के सिरहाने रख लिया !!

अफ़साना आधा छोड़ के सिरहाने रख लिया,

ख़्वाहिश का वर्क़ मोड़ के सिरहाने रख लिया !!

तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं,

ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं !!

आईना देख के अपना सा मुँह लेके रह गए,

साहब को दिल न देने पे कितना गुरूर था।

जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन,

बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए !!

Ghalib Poetry in Hindi 

फिर देखिए अंदाज़-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार,

रख दे कोई पैमाना-ए-सहबा मिरे आगे !!

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ,

मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में !!

है एक तीर जिस में दोनों छिदे पड़े हैं

वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा था

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

जान दी दी हुई उसी की थी

हक़ तो ये है कि हक़ अदा न हुआ

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना

छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़र कहे बग़ैर

Best Ghalib Shayari 

क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी

जो बंदगी में मिरा भला न हुआ

मुज़्दा ऐ ज़ौक़-ए-असीरी कि नज़र आता है

दाम-ए-ख़ाली क़फ़स-ए-मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार के पास

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

ग़ालिब

‘ग़ालिब’ वज़ीफ़ा-ख़्वार हो दो शाह को दुआ

वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब

न हुई गर मिरे मरने से तसल्ली न सही

इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही

इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई

मेरे दुख की दवा करे कोई

ग़ालिब

Ghalib Shayari in Hindi 

ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका

गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ

ग़ालिब

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,

मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं !!

कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता,

तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता !!

गुज़र रहा हूँ यहाँ से भी गुज़र जाउँगा,

मैं वक़्त हूँ कहीं ठहरा तो मर जाउँगा !! 

जो कुछ है महव-ए-शोख़ी-ए-अबरू-ए-यार है,

आँखों को रख के ताक़ पे देखा करे कोई !!

ज़रा कर ज़ोर सीने में कि तीरे-पुर-सितम निकले,

जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले !!

Mirza Ghalib Poetry 

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं

बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ

हो उसका ज़िक्र तो बारिश सी दिल में होती है

वो याद आये तो आती है दफ’तन ख़ुशबू

इक शौक़ बड़ाई का अगर हद से गुज़र जाए

फिर ‘मैं’ के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता

इक क़ैद है आज़ादी-ए-अफ़्कार भी गोया,

इक दाम जो उड़ने से रिहाई नहीं देता

नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने

क्या बने बात जहाँ बात बताए न बने

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

ग़ालिब

Mirza galib ki shayari 

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज

शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक

ग़ालिब

जाँ दर-हवा-ए-यक-निगाह-ए-गर्म है ‘असद’

परवाना है वकील तिरे दाद-ख़्वाह का

ग़ालिब

मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल

उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने

ख़ार ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है

शौक़ गुल-चीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही

ग़ालिब

गुज़रे हुए लम्हों को मैं इक बार तो जी लूँ,

कुछ ख्वाब तेरी याद दिलाने के लिए हैं !!

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही

मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही

ग़ालिब

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

ग़ालिब

Mirza Ghalib Shayari 

Galib ki shayari image

मगर लिखवाए कोई उस को खत

तो हम से लिखवाए

हुई सुब्ह और

घरसे कान पर रख कर कलम निकले..

-मिर्ज़ा ग़ालिब

कहाँ मयखाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज

पर इतना जानते है कल वो जाता था के हम निकले..

-मिर्जा ग़ालिब

बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब

तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते है..

तुम न आओगे तो मरने की हैं सौ तदबीरें,

मौत कुछ तुम तो नहीं है कि बुला भी न सकूं।

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब

दिल का क्या रँग करूँ खून-ए-जिगर होने तक

Ghalib hindi Status 

हो चुकीं ‘ग़ालिब’ बलाएँ सब तमाम

एक मर्ग-ए-ना-गहानी और है

ग़ालिब

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’

कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

ग़ालिब

इनकार की सी लज़्ज़त इक़रार में कहाँ,

होता है इश्क़ ग़ालिब उनकी नहीं नहीं से !!

कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है

मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

ग़ालिब

देखो तो दिल फ़रेबि-ए-अंदाज़-ए-नक़्श-ए-पा,

मौज-ए-ख़िराम-ए-यार भी क्या गुल कतर गई !! 

Famous Ghalib Shayari 

देखिए लाती है उस शोख़ की नख़वत क्या रंग

उस की हर बात पे हम नाम-ए-ख़ुदा कहते हैं

-ग़ालिब

तू ने कसम मय-कशी की खाई है ‘ग़ालिब’

तेरी कसम का कुछ एतिबार नही है..!

-मिर्ज़ा ग़ालिब

है आदमी बजा-ए-ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल,

हम अंजुमन समझते हैं ख़ल्वत ही क्यूँ न हो

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,

कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता !!

बे-नियाज़ी हद से गुज़री बंदा-परवर कब तलक

हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमावेंगे क्या

तुम सलामत रहो हज़ार बरस,

हर बरस के हों दिन पचास हज़ार !!

ता करे न ग़म्माज़ी कर लिया है दुश्मन को

दोस्त की शिकायत में हम ने हम-ज़बाँ अपना

‘ग़ालिब’ नदीम-ए-दोस्त से आती है बू-ए-दोस्त

मश्ग़ूल-ए-हक़ हूँ बंदगी-ए-बू-तराब में

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

होता है तमाशा शब् ओ रोज़ मेरे आगे

Galib ki Shayari

इक आह-ए-ख़ता गिर्या-ब-लब सुब्ह-ए-अज़ल से,

इक दर है जो तौबा को रसाई नहीं देता

इक क़ुर्ब जो क़ुर्बत को रसाई नहीं देता,

इक फ़ासला अहसास-ए-जुदाई नहीं देता

आज फिर पहली मुलाक़ात से आग़ाज़ करूँ,

आज फिर दूर से ही देख के आऊँ उस को !!

ज़िन्दग़ी में तो सभी प्यार किया करते हैं,

मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा !!

तू मिला है तो ये अहसास हुआ है मुझको,

ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है ….

Ghalib Hindi Shayari 

Best of ghalib shayari

खार भी ज़ीस्त-ए-गुलिस्ताँ हैं,

फूल ही हाँसिल-ए-बहार नहीं !!

दिल गंवारा नहीं करता शिकस्ते-उम्मीद,

हर तगाफुल पे नवाजिश का गुमां होता है।

ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,

ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे?

ज़िन्दगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री,

हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे।

आया है बेकसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब,

किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद।

इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया,

दर्द की दवा पाई दर्द बे-दवा पाया।

Mirza Ghalib Shayari in hindi 2 lines 

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

ग़ालिब

‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइ’ज़ बुरा कहे

ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे …

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !!

वो जो काँटों का राज़दार नहीं,

फ़स्ल-ए-गुल का भी पास-दार नहीं !! /

मैं चमन में क्या गया गोया दबिस्ताँ खुल गया,

बुलबुलें सुन कर मिरे नाले ग़ज़ल-ख़्वाँ हो गईं !! 

हम जो सबका दिल रखते हैं

सुनो, हम भी एक दिल रखते हैं

शहरे वफा में धूप का साथी नहीं कोई

सूरज सरों पर आया तो साये भी घट गए

Ghalib Shayari on love 

उस पे आती है मोहब्बत ऐसे

झूठ पे जैसे यकीन आता है

खुद को मनवाने का मुझको भी हुनर आता है

मैं वह कतरा हूं समंदर मेरे घर आता है

फिर आबलों के ज़ख़्म चलो ताज़ा ही कर लें,

कोई रहने ना पाए बाब जुदा रूदाद-ए-सफ़र से !!

एजाज़ तेरे इश्क़ का ये नही तो और क्या है,

उड़ने का ख़्वाब देख लिया इक टूटे हुए पर से !!

साज़-ए-दिल को गुदगुदाया इश्क़ ने

मौत को ले कर जवानी आ गई

मैं तो इस सादगी-ए-हुस्न पे सदक़े,

न जफ़ा आती है जिसको न वफ़ा आती है !!

हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने

ग़ैर को तुझ से मोहब्बत ही सही

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा

जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान झूठ जाना,

कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता ।

Galib shayari 

ग़ालिब ने यह कह कर तोड़ दी तस्बीह.

गिनकर क्यों नाम लू उसका जो बेहिसाब देता है।

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’मर गया पर याद आता है,

वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !

मोहब्बत में नही फर्क जीने और मरने का

उसी को देखकर जीते है जिस ‘काफ़िर’ पे दम निकले..!

-मिर्ज़ा ग़ालिब

मौत फिर जीस्त न बन जाये यह डर है’गालिब’,

वह मेरी कब्र पर अंगुश्त-बदंदाँ होंगे !!

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तिरे पीछे,

तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे !!

कुछ खटकता था मिरे सीने में लेकिन आख़िर,

जिस को दिल कहते थे सो तीर का पैकाँ निकला !!-

अच्छा है सर-अंगुश्त-ए-हिनाई का तसव्वुर,

दिल में नज़र आती तो है इक बूँद लहू की !!

Ghalib Ke Sher 

की मेरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा,

हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना !! –

आता है मेरे क़त्ल को पर जोश-ए-रश्क से

मरता हूँ उस के हाथ में तलवार देख कर

करने गये थे उनसे तगाफुल का हम गिला,

की एक ही निगाह कि हम खाक हो गये !! –

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,

अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता !! –

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ

मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ !!

इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं,

जी ख़ुश हुआ है राह को पुर-ख़ार देख कर !!

‏मुहब्बत में उनकी अना का पास रखते हैं,

हम जानकर अक्सर उन्हें नाराज़ रखते हैं !!

चाहें ख़ाक में मिला भी दे किसी याद सा भुला भी दे,

महकेंगे हसरतों के नक़्श* हो हो कर पाएमाल^ भी !!

Ghalib whatsapp status 

पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार

और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो

हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो

कि चश्म-ए-तंग शायद कसरत-ए-नज़्ज़ारा से वा हो

हम तो जाने कब से हैं आवारा-ए-ज़ुल्मत मगर,

तुम ठहर जाओ तो पल भर में गुज़र जाएगी रात !!

है उफ़ुक़ से एक संग-ए-आफ़्ताब आने की देर,

टूट कर मानिंद-ए-आईना बिखर जाएगी रात !!/

नसीहत के कुतुब-ख़ाने* यूँ तो दुनिया में भरे हैं,

ठोकरें खा के ही अक्सर बंदे को अक़्ल आई है !!

Shayari of ghalib on ishq

Mirza Ghalib Shayari in hindi

ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है

हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमाँ क्यूँ हो

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को

ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर,

आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में !!

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

हम महव-ए-चश्म-ए-रंगीं-ए-जवाब* हुए हैं जबसे,

शौक़-ए-दीदार हुआ जाता है हर सवाल का रंग !!

जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की,

लिख दीजियो या रब उसे क़िस्मत में अदू की !!

हर रंज में ख़ुशी की थी उम्मीद बरक़रार,

तुम मुस्कुरा दिए मेरे ज़माने बन गये !!

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

गा़लिब

Ghalib Sher 

कुछ लम्हे हमने ख़र्च किए थे मिले नही,

सारा हिसाब जोड़ के सिरहाने रख लिया !!

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र

काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

चाँदनी रात के खामोश सितारों की कसम,

दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं।

आता है दाग-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,

मुझसे मेरे गुनाह का हिसाब ऐ खुदा न माँग।

उनके देखने से जो आ जाती है चेहरे पर रौनक,

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।

Check Also - 

No comments:

Post a comment